Betul News: रमजान पर मुस्लिमों को 50 साल से सेहरी के लिए जगा रहे हिन्दू पिता पुत्र
Betul News: Hindu father and son have been waking up Muslims for Sehri during Ramadan for 50 years

साम्प्रदायिक सद्भावना के निभा रहे अपना फर्ज
Betul News: बैतूल। मुस्लिम समाज रमजान के पवित्र माह में अल्लाह की इबादत में डूबा हुआ है। इस सबके बीच हिन्दू समाज का एक तबका ऐसा भी है जो इबादत में समाज के लोगों की इस इबादत में सहभागी बनकर खुद भी पुण्य का हकदार बन रहा है।
कोठीबाजार क्षेत्र में मातंग समाज से ताल्लुक रखने वाले रज्जू औऱ उनका पुत्र राजा वानखेड़े रोजाना सुबह सेहरी के लिए मुस्लिम समाज के लोगों को उठाने का काम कर रहे हैं। एक पैर से दिव्यांग हो चुके रज्जू अपने उस फर्ज को आज भी बखूबी निभा रहे हैं, जिस फर्ज की शुरुआत उन्होंने होश संभालते ही शुरू कर दी थी। अगले ईद के त्योहार तक उनका यह फर्ज लगातार जारी रहेगा।
नियम के अनुसार मुस्लिम समाज को रोजा रखने से पहले सेहरी करना होता है। इसके लिए उन्हें अल सुबह इबादत के लिए उठना पड़ता है। कोई भी इस नेक काम से चूक न जाए, इसके लिए रज्जू और उनका पुत्र राजा आधी रात ही अपने घर से बाहर निकल जाते हैं। साम्प्रदायिक सद्भावना से परिपूर्ण रज्जू बताते हैं कि वे पिछले 50 सालों से इस नेक काम को अंजाम दे रहे हैं।
एक पैर से दिव्यांग होने के बाद अब उनका पुत्र भी उनका सहभागी बन चुका है। सेहरी के लिए मुस्लिम धर्मावलम्बियों को जगाने के लिए वे खुद रात 3 बजे उठ जाते हैं और कोठीबाजार क्षेत्र के मुस्लिम बहुल इलाके तिलक वार्ड, आजाद वार्ड, कृष्णपुरा, आर्यपुरा वार्डों की गली मोहल्लों के प्रत्येक घरों के दरवाजों पर पहुंचकर लोगों को सेहरी के लिए जगाना शुरू करते हैं। उन्हें इस बात का सुकून है कि मुस्लिम समाज के लोग भी उनकी आवाज सुनकर समय पर अपनी इबादत में डूब जाते हैं।
सड़क हादसे ने छीन लिया एक पैर, भजनों के भी हैं शौकीन
अपने पिता पर गुजरी आपबीती सुनाते राजा वानखेड़े बताते हैं कि हमने और हमारे परिवार ने कभी भी किसी धर्म के प्रति मन मे भेदभाव नहीं रखा। पिता रज्जू भजन कीर्तनों की शुरू से ही शौकीन रहे हैं। मंदिरों में भजन, रामायण, सुंदर कांड पाठ के साथ ढोलक के भी बेतरीन कलाकार हैं। उन्होंने करीब 50 वर्ष पूर्व मुस्लिम समाज के लोगों को रमजान के महीने में सेहरी के लिए जगाना शुरू किया था।
एक सड़क हादसे में डॉक्टरों को पिता का एक पैर जरूर काटना पड़ा, लेकिन उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई। तकलीफों के बावजूद सेहरी का क्रम उन्होंने लगातार जारी रखा। पिता की इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भी पिता का साथ दिया औऱ आज हम दोनों पिता पुत्र पुण्य के इस कार्य मे बराबरी के सहभागी बन रहे हैं।




