Politics: राजनीतिक हलचल: इस पार्टी में तू डाल- डाल, मैं पात, पात के हालात क्यों?? हाथ से निकला मामला तो कौनसे माननीय पानी- पानी हुए???पार्टी बदलने से गुमनामी की ज़िंदगी क्यों जी रहे?????? पढ़िए पूरी ख़बर हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में…..

Politics: Political stir: You put in this party, I am in power, why is there a situation of power in power?? If the matter got out of hand then which honorable person would be in trouble?

यहां तू डाल-डाल, मैं पात-पात के हालात

जिले में विपक्षी की भूमिका निभाने वाली एक पार्टी की हालत तू डाल-डाल, मैं पात-पात जैसी हो गई है। कहने का तात्पर्य यह है कि पार्टी विपक्षी की भूमिका सशक्त रूप से निभा नहीं पा रही है। इसकी बानगी समय-समय पर देखने को मिली है, लेकिन पिछले दिनों पुलिस विभाग में दुष्कर्म शिकार महिला की रिपोर्ट 10 घंटे तक नहीं लिखने के मामले में स्थानीय नेताओं ने विस में प्रश्न उठाने के लिए विधायकों को भेजे, लेकिन इस संवेदनशील मामले में न तो स्थानीय और न ही भोपाल के नेताओं ने कोई प्रयास किया। कुल मिलाकर विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मामला निकल गया और नेता हाथ पर हाथ रखकर बैठे रह गए। कहा जा रहा है कि राजनीति में इस मामले को दमदारी से उठाया जाता तो सत्ता पक्ष की बोलती बंद हो जाती है और विभाग के कई अधिकारी नप जाते, लेकिन विपक्ष के नेताओं की चुप्पी ने जिले की राजनीति का स्तर कितना बदल दिया है, इस पर खूब चर्चाएं चल रही हैं।

हाथ से निकला मामला तो माननीय पानी-पानी

एक माननीय अपने क्षेत्र की पुण्य सलीला के मामले में टिप्पणी को लेकर शुरू से लेकर आखरी तक चुप बैठे रहे। उनकी चुप्पी पर कई सवाल खड़े हो गए। पुजारियों और मां के भक्तों ने नाराजगी जताई तो लगे हाथ क्षेत्र के ही एक नेता ने मां के नाम बयानबाजी करने वाले कथा वाचक को जानकारी दी। उन्होंने भी हाथों-हाथ लेते हुए प्रतिनिधि मंडल को अपने गृह क्षेत्र बुला लिया। यहां हमेशा की तरह कथा वाचक ने खेद जताते हुए जयंती महोत्सव पर भी श्रद्धालुओं से अधिक संख्या में पहुंचने का आग्रह कर डाला। यह मामला माननीय के हाथ से छिटकने पर उनके तथाकथित छुटभैए समर्थक दुखी है, लेकिन माननीय को इसका कोई मलाल नहीं। चर्चा है कि वे कह रहे हैं कि चुनाव को अभी पूरे साढ़े चार साल है। हालांकि उन्हें कौन बताए कि ऐसे मामलों को चुनाव के समय भुनाना राजनीति में आम बात है।

पार्टी बदलने वाले गुमनामी की जिंदगी जी रहे

चुनाव के पहले पार्टी बदलना कुछ नेताओं पर अब भारी पड़ रहा है। भले ही उन्होंने जिस पार्टी का दामन थामा है,उसका दबदबा है, लेकिन वर्तमान हालात में कुछ नेता ऐसे हैं, जिनकी दाल नहीं गल रही है। चर्चा है कि पार्टी का दामन थामने वालों ने संतोषजनक आश्वासन के बाद झंडा थामा था, लेकिन उनकी हालत अब घर के ना घाट के… जैसी हो गई है। इनमें से अधिकांश कालोनाइजर और ठेकेदार जिनके कामों में अधिकारियों की अड़चन आ रही है। एक नेता तो ऐसे भी है, जिनका कालोनाइजिंग का काम में रोड़ा आने के बाद कह रहे हैं कि पुरानी पार्टी में ही ठीक थे।

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Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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