Betul Ki Khabar: आंखों से विवादित ढांचा गिरते देखा, साथ गए लोग वापस आ गए, लेकिन वापस आने का नहीं किया मन
Betul Ki Khabar: Saw the disputed structure falling with my eyes, the people who had gone with me came back,

Betul Ki Khabar: मैं शुरू से पढऩे में कमजोर था, इसलिए पारिवारिक स्थिति के कारण ज्यादा स्कूल नहीं जा सका। हालांकि धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण सामाजिक और राजनीति गतिविधियों में शामिल होते रहता था। बात उस समय की है जब मुझे लोगों ने वर्ष 1992 में बताया था कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर कुछ मामला सामने आया। यहां भाजपा के बड़े नेताओं की सभा होने वाली है। सभी लोग कार सेवा करने जा रहे है,बस यही से मेरे मन में भी कार सेवा करने की इच्छा जागी। (Betul Ki Khabar) इसके बाद उस समय बजरंग दल से जुड़े अलकेश आर्य और पूरन साहू के साथ 15 नवम्बर के आसपास अयोध्या जाने का निर्णय लिया।
परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं थे, लेकिन मन में अयोध्या जाने की इच्छा थी, इसलिए किसी की बात नहीं मानी। सबसे पहले हम टीम के साथ फैजाबाद पहुंचे। यहां सभी को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई, लेेकिन मैं एक परिचित महिला पुलिसकर्मी के यहां रूक गया।(Betul Ki Khabar) यहां से करीब 30 नवम्बर के आसपास अयोध्या पहुंचा। साथियों के साथ मुझे भी मंदिर के लिए ईंट, मिट्टी और अन्य सामग्री लाने की जिम्मेदारी थी। सुबह से शाम तक यह जवाबदारी निभाते समय एक क्षण भी न तो घर का ख्याल आया और न ही भूख लगी। एक बात दावे से कह सकता हूं कि अयोध्या पहुंचने के बाद भगवान राम ने जैसे आशीर्वाद दिया कि इतनी सेवा करने के बाद भी थकान नहीं होती थी। यह बात अन्य लोगों को भी बताई तो वे भी ऐसी बातें करते थे।(Betul Ki Khabar)
आखिर 6 दिसम्बर का वह क्षण भी आ गया जब बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी और उमा भारती की बड़े पंडाल में सभा चल रही थी, मैं भी उनके भाषण को सुनकर रहा था। दोपहर को उनके भाषण के बाद कार सेवकों की भीड़ विवादित स्थल की ओर कूच कर गई तो मैं भी उसी ओर चला गया। कार सेेवक विवादित स्थल को सब्बल और अन्य साधनों से ढहा रहे थे। मुझे गर्व है कि इस पल का मैं भी न सिर्फ साक्षी बना बल्कि विवादित स्थल को सब्बल से ढहाने का अवसर मिला। मैंने आंखों के सामने विवादित ढांचे को कार सेवकों द्वारा ढहाते हुए देखा।(Betul Ki Khabar) ढांचा ढहाने के बाद मुझे अन्य कार सेवकों ने बताया कि यहां स्थिति बिगड़ सकती है, लेकिन मुझे परिचित महिला पुलिसकर्मी ने यहां से फैजाबाद चलने के लिए कहा, हालांकि मेरा मन अयोध्या में ही रूकने का था, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए मन मसोज कर यहां से विदा ली तो आंखे नम हो गई। इसके बाद भी मैं बैतूल नहीं आया और 15 दिनों तक फैजाबाद में ही परिचित महिला पुलिसकर्मी के यहां रूका रहा। उस समय मोबाईल आदि नहीं था इसलिए घर वालों को सूचना नहीं दे पाया।(Betul Ki Khabar)
करीब 15 दिन बाद मैं बैतूल आया तो मुझे पता चला कि कार सेवक, साथी और घर वाले मुझे तलाश कर रहे है, क्योंकि अयोध्या में स्थिति बिगड़ गई थी, ऐसे में उनका चिंतित होना स्वाभाविक था। हालांकि मेरे सकुशल वापसी आने के बाद परिजनों और साथी कारसेवकों की खुशी का ठिकाना देखने लायक था। कुल मिलाकर यह कह सकता हूं कि अयोध्या में की गई सेवाओं का एक-एक क्षण आज भी मेरे मस्तिष्क पटल पर अंकित है, जिसे कभी नहीं भूला पाउंगा। एक बात और कहना चाहता हंू कि आर्थिक परिस्थिति कमजोर होने के बाद मन में मंदिर जाने की टीस है। भगवान श्रीराम ने चाहा तो एक बार रामलला के नए इस मंदिर को अपनी आंखों से देखूंगा।(Betul Ki Khabar)
(जैसा रामप्रसाद नागले उर्फ झिंगा ने ज्ञानदेव लोखंडे को बताया)





