Betul Ki Khabar: बैतूल में गहराते जलसंकट के बीच याद आए पानी वाले बाबा

दिवंगत कलेक्टर रजनीकांत गुप्ता के प्रयासों से सीख लेकर जनभागीदारी से चलाना होगा अभियान
Betul Ki Khabar: (निखिल सोनी) बैतूल। जिले में कम बारिश के चलते जहां फसलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जलस्रोतों का घटता जलस्तर भी आने वाले दिनों की चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे हालात में पानी की हर बूंद सहेजने और बारिश के पानी को जमीन में उतारने की जरूरत महसूस होने लगी है। जल संकट के बीच बैतूल में ‘पानी वाले बाबाÓ के नाम से पहचान बनाने वाले दिवंगत कलेक्टर रजनीकांत गुप्ता के प्रयास एक बार फिर याद किए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब जल संकट गहराने लगा है, तो पानी बचाने के लिए जिले में व्यापक स्तर पर पहल कब होगी?
बारिश की कमी का असर खेती-किसानी के साथ प्राकृतिक जलस्रोतों पर भी पड़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बनाए रखना चुनौती बन सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए बारिश के पानी को बहकर व्यर्थ जाने से रोकना और भूजल स्तर बढ़ाने के प्रयास करना जरूरी है। इसके लिए प्रशासन को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण की कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता है।
बोरी बंधान से सहेज सकते हैं बारिश का पानी
ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे नालों और जलप्रवाह वाले स्थानों पर उपयुक्त तकनीक से बोरी बंधान तैयार कर पानी को कुछ समय तक रोका जा सकता है। इससे पानी के बहाव की गति कम करने, आसपास की जमीन में नमी बनाए रखने और भूजल पुनर्भरण में मदद मिल सकती है। कम लागत वाले ऐसे उपाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाए जाएं, तो जल संरक्षण के प्रयासों को गति मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए जलप्रवाह, मिट्टी और सुरक्षा संबंधी तकनीकी पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।
‘पानी वाले बाबाÓ की सोच आज भी प्रासंगिक
बैतूल में जल संरक्षण की बात हो और दिवंगत कलेक्टर रजनीकांत गुप्ता का स्मरण न हो, ऐसा संभव नहीं है। पानी बचाने के प्रयासों के कारण उन्हें ‘पानी वाले बाबाÓ के नाम से जाना जाता था। जल संरक्षण के प्रति उनकी सोच आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान परिस्थितियों में उनके प्रयासों से प्रेरणा लेकर पानी सहेजने के लिए नए सिरे से अभियान चलाने की जरूरत है।
प्रशासन और ग्रामीणों को मिलकर करना होगा प्रयास
जल संकट से निपटने के लिए केवल बारिश के भरोसे बैठे रहना पर्याप्त नहीं होगा। ग्राम पंचायतों, किसानों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन को मिलकर बोरी बंधान निर्माण, पुराने जलस्रोतों के संरक्षण और बारिश के पानी को सहेजने के उपायों पर काम करना होगा। साथ ही, पहले से बनी जल संरचनाओं का रखरखाव और नियमित निगरानी भी जरूरी है। जल संकट के मौजूदा हालात एक चेतावनी हैं। यदि समय रहते जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए और जनभागीदारी से ठोस कदम उठाए जाएं, तो भविष्य में पेयजल और सिंचाई की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। ऐसे समय में ‘पानी वाले बाबाÓ के प्रयासों को याद करना ही नहीं, बल्कि उनकी सोच को धरातल पर उतारना भी जरूरी है।
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