Politics: राजनीतिक हलचल: पुराने वफ़ादारों की अनदेखी पर महिला नेत्री और परिजन किस नेता से हुए नाराज?? नेता प्रतिपक्ष की ख़ामोशी पर सियासी सवाल क्यों??? बीमार पार्षद के लिए मुम्बई से आई मदद के 10 हजार किसने डकारे???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में…..

पुराने वफादारों की अनदेखी, नए चेहरों पर मेहरबानी
विपक्षी खेमे में इन दिनों सियासी उठापटक की चर्चाएं तेज हैं। जिला प्रमुख की एक पूर्व अधिकारी नेत्री पर बढ़ती मेहरबानी अब पार्टी की एक आरक्षित क्षेत्र की महिला नेत्री को खटकने लगी है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि बरसों तक पार्टी के लिए चप्पलें घिसने और हर मोर्चे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाली नेत्री अब खुद को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रही हैं।
नेत्री की नाराजगी इस बात को लेकर बताई जा रही है कि जब पार्टी के लिए संघर्ष करने वालों को तवज्जो देने की बारी आती है, तब उन्हें किनारे कर दिया जाता है। वहीं, दूसरी ओर ऐसे चेहरों को हथेली पर रखने की कोशिश हो रही है, जिनका पार्टी में योगदान ही चर्चा का विषय बना हुआ है।
मामला अब घर की चौखट तक पहुंच गया है। चर्चा है कि नेत्री के परिजन भी जिला प्रमुख को दोगला और मौकापरस्त कहने से नहीं चूक रहे। अब सवाल यह है कि जिला प्रमुख पुराने वफादारों को मनाएंगे या यह नाराजगी विपक्ष के भीतर नई सियासी दरार पैदा करेगी?
नेता प्रतिपक्ष की खामोशी पर सियासी सवाल, सलाहकार के प्रभाव की चर्चा!
एक प्रमुख निकाय में नेता प्रतिपक्ष की खामोशी इन दिनों सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। विपक्ष की भूमिका में रहते हुए भी उनकी चुप्पी समर्थकों के गले नहीं उतर रही। आखिर मुद्दे भी हैं, मौके भी हैं, फिर आवाज बुलंद करने में हिचकिचाहट क्यों? समर्थकों के बीच चर्चा है कि एक अल्पसंख्यक नेता, जिन्हें सियासी हलकों में ‘मौसम विज्ञानीÓ के नाम से पुकारा जाता है, का प्रभाव नेता प्रतिपक्ष पर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है।
चुटकी लेने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि सलाह-मशविरे के फेर में नेता प्रतिपक्ष अपनी ही पार्टी की अंदरूनी राजनीति में ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि न इधर के रहे, न उधर के। अब सवाल यह है कि यह खामोशी किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है या फिर सियासी सलाहों का असर? फिलहाल निकाय की राजनीति में चर्चाओं का दौर जारी है। सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि नेता प्रतिपक्ष कब अपनी चुप्पी तोड़कर सक्रिय भूमिका में नजर आते हैं।
मुंबई से आई मदद, बीच में अटके 10 हजार! भेद खुला तो मची हलचल
राजनीति और कारोबार की दुनिया में इन दिनों मदद की रकम को लेकर एक किस्सा खूब चटखारे लेकर सुनाया जा रहा है। चर्चा है कि विपक्षी पार्टी के एक वरिष्ठ पार्षद की बीमारी की खबर सुनकर मुंबई में बैठे उनके हमदर्द उद्योगपति ने मदद के लिए 50 हजार रुपए भेजे। रकम पहुंचाने की जिम्मेदारी दादावाड़ी मार्ग के एक होटल व्यवसायी को सौंपी गई, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब चर्चा फैल गई कि मदद की रकम में से 10 हजार रुपए पार्षद तक पहुंचे ही नहीं!
बताया जाता है कि उद्योगपति के भतीजे और एक प्रमुख नेता तक यह बात पहुंची तो मामला सीधे आमने-सामने की बैठक तक जा पहुंचा। होटल व्यवसायी और पार्षद की पत्नी को बुलाकर हिसाब मांगा गया। घिरते देख व्यवसायी ने सफाई दी कि 10 हजार रुपए वह अपनी ओर से मिलाकर देना चाहता था, इसलिए रकम रोक रखी थी। आखिरकार 10 हजार रुपए वापस लौटा दिए गए।
अब सियासी गलियारों से लेकर व्यापारी जगत तक सवालिया ठहाके गूंज रहे हैं कि मदद की रकम में ऐसी हिसाब-किताब वाली मेहरबानी आखिर किस काम की?




