Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: आख़िर कौनसे थानेदार की दबंगई के आगे अफसर भी दिख रहे बौने?? निकाय के कौनसे अफसर है, जिनके काम के सभी हो रहे कायल??? सड़क वाले कौनसे साहब आखिर अपनी मर्ज़ी के मालिक???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में……

थानेदार दबंगई के आगे सब बौने
बैतूल अनुविभाग के विवादित थानेदार की दबंगई की चर्चे अब पूरे महकमे में हो रहे हैं। दरअसल साहब जिस थाने में पदस्थ है, वहां वे खुद को शिकायत लेकर जाने वाले फरियाद से सीधे मुंह बात नहीं करते हैं। इसके बाद उनके अधीनस्थ स्टाफ की बात और कुछ है। चर्चा है कि छोटे मामलों में शिकायत लेकर जाने वालों को यहां से गाली- गलौच कर बैरंग लौटया जाता है। गरीब तबके के लोग वरिष्ठ अधिकारियों तक शिकायत नहीं कर पाते हैं, इसलिए इनकी दबंगई बहुत ज्यादा बढ़ रही है।
चर्चा है कि थाने पहुंचने वाले लोगों के सामने चाय-काफी और शीतल पेय का उपयोग करने के दौरान थानेदार साहब किसी से बात तक नहीं करते हैं। यही वजह है कि कई फरियादी बिना शिकायत किए थाने से लौट रहे हैं। कप्तान के पास भी इनकी शिकायत पहुंचना आम बात हो गई है,लेकिन थानेदारों की कमी की वजह से इन पर कार्रवाई न होने की चर्चा आम है। बताते चले कि यह वही थानेदार है, जिन्हें शाम होते ही मदहोश देखा जा सकता है। फिलहाल बड़े थाने से इन्हें छोटे थाने की कमान सौंपी गई है।
साहब के काम के कायल हुआ स्टाफ
वैसे तो अधिकारियों से अधीनस्थ स्टाफ का 36 का आंकड़ा आम बात है। इसकी मुख्य वजह अधिकारियों का कर्मचारियों के प्रति कड़ा रूख माना जाता है, लेकिन इसके उलट जिले की एक निकाय के प्रमुख कड़क स्वभाव के साथ हमदर्दी के लिए भी खासे सुर्खियों में है। इन अधिकारी को निकाय में आने को अभी चंद दिनों ही हुए हैं, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली खासी सुर्खियां बटोर रही है। वे काम के प्रति इतने ईमानदार है कि सुबह 9.30 बजे दफ्तर पहुंचकर कर्मचारियों को समय पर कार्यालय आने के लिए स्वप्रेरणा बनेंगे। इतना ही नहीं लंच टाइम में कार्यालय में ही टिफिन बुलवाकर कर्मचारियों के बीच भोजन करना और फिर काम से लग जाना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं। इसी वजह निकाय में फिलहाल टीम वर्क से काफी बेहतर काम हो रहा है।
मर्जी के मालिक सड़क वाले बॉस
सड़क के काम से जुड़े एक सुपर बॉस इन दिनों अपनी मनमर्जी के लिए प्रशासनिक अमले में चर्चा का विषय बने हैं। कई दिनों तक सड़क वाले इन साहब को दो जगह का प्रभार मिला था। इस दौरान जमकर मलाई खाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ माह पहले ही एक जगह दूसरे साहब की पदस्थापना हुई तो इन अधिकारी का रवैया ही बदल गया। वैसे पहले भी न तो इनके कार्यालय आने का समय था और न ही जाने का। अब उनका कार्यालय शहर की एक कालोनी में अलग स्थान पर है, इसलिए यहां कर्मचारी साहब का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन वे सरकारी बैठकों का बाहना बनाकर कार्यालय पहुंचने में काफी कंजूसी कर रहे हैं। इसी वजह सड़क निर्माण से जुड़े काम और ठेकेदार भी इन साहब की कारगुजारी से खासे परेशान हो गए हैं।
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