Betul News: 8 वर्षों में कौसले ने कई रजिस्ट्रियों में किए वारे-न्यारे

कुछ मामले लापरवाही के लिए बने उदाहरण, अधिकारी जांच कराए तो आएगी वास्तविकता सामने
Betul News: बैतूल। जिला पंजीयन कार्यालय में रजिस्ट्री और दस्तावेजों से जुड़े मामलों को लेकर लगातार सामने आ रही शिकायतों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले कुछ दिनों में सामने आए मामलों के बाद अब मांग उठने लगी है कि पिछले 8 वर्षों में हुई संदिग्ध रजिस्ट्रियों और विवादित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। शिकायतों और आरोपों की जांच यदि रिकॉर्ड के आधार पर कराई जाती है तो कई मामलों की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
दरअसल, जिला पंजीयन कार्यालय में लंबे समय से पदस्थ जिला पंजीयक दिनेश कौसले को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि एक ही जिले में लंबे समय तक पदस्थ रहने के कारण सर्विस प्रोवाइडरों, जमीन कारोबार से जुड़े लोगों और कॉलोनाइजरों से इनकी नजदीकियां बढ़ीं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी बाकी है।
नकल के लिए 300 की जगह 1500 रुपए लेने की शिकायत से शुरू हुआ मामला
हाल ही में कार्यालय में दस्तावेजों की नकल उपलब्ध कराने के नाम पर निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक राशि लेने की शिकायत सामने आई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 300 रुपए के स्थान पर 1500 रुपए लिए गए। मामला सामने आने के बाद कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे और इसके बाद रजिस्ट्री प्रक्रिया से संबंधित अन्य शिकायतें भी चर्चा में आने लगीं।
मामले को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि दस्तावेजों की नकल जैसे सामान्य काम में निर्धारित शुल्क से अधिक राशि ली जा रही थी तो क्या रजिस्ट्री से जुड़े अन्य कार्यों की भी इसी तरह जांच की गई है। विभागीय जांच होने पर ही इसकी वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।
लंबे कार्यकाल को लेकर भी उठ रहे सवाल
जिला पंजीयन कार्यालय से जुड़े जानकारों का कहना है कि पिछले 8-9 वर्षों से अधिकारी का जिले में लगातार प्रभाव बना हुआ है। आरोप है कि तबादले के बावजूद पदस्थापना में बदलाव नहीं हो सका। इसी लंबे कार्यकाल को अब कार्यालय में सामने आ रही शिकायतों से जोड़कर देखा जा रहा है।
आरोप यह भी हैं कि लंबे समय से पदस्थापना के कारण कार्यालय में काम करने वाले कुछ सर्विस प्रोवाइडरों और जमीन से जुड़े कारोबारियों की अधिकारियों तक आसान पहुंच बनी रही। कई मामलों में नियमों को लेकर सवाल उठने के बावजूद प्रक्रिया आगे बढ़ने की शिकायतें भी सामने आई हैं। हालांकि यह सभी आरोप हैं। इनकी पुष्टि के लिए पिछले वर्षों की रजिस्ट्रियों, दस्तावेजों और संबंधित रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।
कॉलोनाइजरों की रजिस्ट्रियों की भी हो जांच
रजिस्ट्री कार्यालय में जमीन से जुड़े कारोबारियों और कॉलोनाइजरों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाए जाने की जरूरत बताई जा रही है। जानकारों के मुताबिक, कॉलोनियों में जमीन की खरीद-बिक्री से पहले कई तरह की वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करना जरूरी होता है।
ऐसे में पिछले वर्षों में हुई कॉलोनियों की रजिस्ट्रियों का रिकॉर्ड खंगाला जाए तो यह पता लगाया जा सकता है कि संबंधित जमीनों की स्थिति क्या थी और रजिस्ट्री के समय सभी जरूरी दस्तावेज मौजूद थे या नहीं। यदि किसी ऐसी जमीन की रजिस्ट्री हुई है, जिस पर नियमों के तहत रोक थी, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा। इसके लिए केवल शिकायत के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड का मिलान कर जांच की जरूरत होगी।
पहला मामला: आधार और खसरा में अलग-अलग नाम
हाल में सामने आए एक मामले ने दस्तावेजों की जांच व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार रजिस्ट्री से जुड़े व्यक्ति का नाम आधार कार्ड में अजय (परिवर्तित नाम), जबकि खसरा रिकॉर्ड में अज्जू (परिवर्तित नाम)दर्ज होने की बात सामने आई थी।
इस मामले में कलेक्टर ने संज्ञान लेकर जांच शुरू कराई है। अब जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दस्तावेजों में नाम अलग होने का कारण क्या है। क्या यह केवल नाम में तकनीकी अंतर है या फिर दस्तावेजों के स्तर पर गंभीर गड़बड़ी हुई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
दूसरा मामला: कुर्क संपत्ति की बिक्री का आरोप
वर्ष 2023 में भी रजिस्ट्री कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप सामने आए थे। गर्ग कॉलोनी निवासी अनुरंजन सिंह चौहान ने शिकायत करते हुए आरोप लगाया था कि खेड़ी सांवलीगढ़ स्थित उनके विवादित स्टोन क्रेशर और जमीन की न्यायालयीन कुर्की की कार्रवाई से पहले ही करीब 3 करोड़ रुपए की कुर्क संपत्ति बेच दी गई।
चौहान ने पंजीयक और उपपंजीयक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए शिकायत की थी। तत्कालीन कलेक्टर ने मामले की जांच के निर्देश भी दिए थे। शिकायतकर्ता का आरोप है कि मामले में अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी संपत्ति पर न्यायालयीन कार्रवाई या कुर्की की प्रक्रिया चल रही थी, तो उसकी स्थिति की जानकारी रजिस्ट्री के समय किस स्तर पर जांची गई, यह जांच का प्रमुख बिंदु होना चाहिए।
पुराने मामलों की फाइल खुली तो सामने आएगी पूरी तस्वीर
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पिछले 8 वर्षों में कितनी ऐसी रजिस्ट्रियां हुईं, जिनमें बाद में विवाद सामने आया। कितनी संपत्तियां न्यायालयीन विवाद में थीं, कितनी जमीनों के दस्तावेजों में नाम या रिकॉर्ड को लेकर अंतर था और कितनी रजिस्ट्रियां ऐसी हुईं, जिन पर बाद में आपत्ति दर्ज कराई गई।
यदि जिला प्रशासन पिछले 8 वर्षों का रिकॉर्ड खंगालकर संदिग्ध रजिस्ट्रियों का ऑडिट कराए तो शिकायतों की वास्तविकता सामने आ सकती है। खासकर विवादित जमीन, कुर्क संपत्ति, कॉलोनाइजरों की जमीन, नामांतरण से जुड़े दस्तावेज और न्यायालयीन मामलों वाली संपत्तियों की रजिस्ट्रियों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
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