Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: आखिर सिफारिश और वायरल ऑडियो का सच क्या है?? किस थाने में एफआईआर पर लगा ब्रेक तो शिकायत पहुंची डीजीपी तक??? पुराने साहब का खेल, नए साहब के हिस्से कैसे आ रहा????? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में……

सिफारिश!
बैतूल के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक निर्माण से जुड़े अफसर का तबादला और उसके बाद शुरू हुई कथित सिफारिश चर्चा का विषय बनी हुई है। अफसर के खिलाफ कमीशनबाजी से जुड़ा ऑडियो वायरल होने के बाद मामला पहले ही सुर्खियों में आ चुका था। अब चर्चा यह है कि तबादले के बाद अफसर के पक्ष में सट्टे के लिए बदनाम एक व्यक्ति की ओर से मैनेजमेंट की कोशिश की गई। चर्चा है कि आमला के एक मीडिया कर्मी को कथित तौर पर मोनू बैटरी नाम से चर्चित व्यक्ति का फोन आया। बातचीत में उसने उक्त अफसर को अपने दोस्त की करीबी बताते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि मामला बैठकर बातचीत से सुलझाया जा सकता है।
दिलचस्प मोड़ तब आया, जब ‘बैटरीÓ के बताए गए फ्रेंड की खोजबीन की गई। चर्चा में सामने आया कि वह व्यक्ति निर्माण कार्यों से जुड़ा एक ठेकेदार है। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल यही घूम रहा है कि मामला महज दोस्ती और जान-पहचान का है या फिर तबादले के बाद पर्दे के पीछे कोई ‘सेटिंगÓ चल रही है? आखिर एक निर्माण विभाग के अफसर के लिए सट्टे की दुनिया से जुड़े व्यक्ति की दिलचस्पी क्यों बढ़ गई? वैसे सरकारी दफ्तरों में तबादले कोई नई बात नहीं, लेकिन जब किसी अफसर के वायरल ऑडियो, कमीशन की चर्चा और उसके बाद कथित सिफारिश की कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ने लगें तो सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
थाने में एफआईआर पर ब्रेक, डीजीपी तक पहुंची शिकायत!
शाहपुर अनुविभाग के एक चर्चित एयर लंबे समय से एक ही जगह जमे थाना प्रभारी को लेकर इन दिनों पुलिस विभाग के गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। लंबे समय से एक ही थाने में जमे इस टीआई पर क्षेत्र में सक्रिय बताए जा रहे एक गिरोह को कथित संरक्षण देने के आरोप लगाए जा रहे हैं। मामला अब स्थानीय स्तर की चर्चाओं से आगे बढ़कर पुलिस मुख्यालय तक पहुंचने की बात कही जा रही है।
विभागीय चर्चाओं पर भरोसा करें तो क्षेत्र में एक गिरोह की गतिविधियों से लोग परेशान हैं, लेकिन आरोप है कि संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के प्रयासों के बावजूद पुलिस कार्रवाई करने से बचती रही। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शिकायतें और उनके समर्थन में प्रमाण मौजूद हैं तो फिर मामला थाने की चौखट पर ही क्यों अटक रहा है? बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज और अन्य प्रमाण डीजीपी के समक्ष प्रस्तुत किए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनके पास ऐसे तथ्य हैं, जिनसे पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अब यदि मामला डीजीपी स्तर तक पहुंच चुका है तो जांच की दिशा में अगला कदम क्या होगा, इस पर सबकी नजर है। चर्चा यह भी है कि पुलिस मुख्यालय के बाद मामले की जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की तैयारी है। हालांकि आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। मामला सिर्फ एक थाना प्रभारी तक सीमित नहीं है। यदि किसी थाने में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर पक्षपात या दबाव की शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो उसका असर पूरे पुलिस विभाग पर पड़ता है। फिलहाल सम्बंधित थाने से लेकर पुलिस महकमे तक एक ही सवाल तैर रहा है कि ‘एफआईआर में आखिर इतनी हिचक क्यों?Ó
पुराने साहब का खेल, नए साहब के माथे आया हिसा!
जिले के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों पुराने और नए साहब की कहानी खूब चटखारे लेकर सुनाई जा रही है। चर्चा है कि एक बड़े पद वाले पुराने साहब ने अपने कार्यकाल में लंबे समय तक ईमानदारी की मिसाल पेश करने की कोशिश की, लेकिन जिले से विदाई लेने से पहले ऐसा कुछ कर गए कि अब उसका हिसाब नए साहब को समझना पड़ रहा है। नए साहब के करीबी बताते हैं कि मामला इतना उलझा हुआ है कि पुरानी फाइलें खोलते ही नई परेशानी सामने आ जाती है। साहब की कथित पीड़ा भी बड़ी दिलचस्प बताई जा रही है— ‘कचरा तो साफ करना है, लेकिन सफाई करते-करते हाथ हमारे भी गंदे हो जाएंगे।Ó दरअसल, प्रशासनिक दफ्तरों में पुरानी फाइलें सिर्फ कागज नहीं होतीं, उनमें पुराने फैसलों की कहानी भी छिपी रहती है।
यही वजह है कि नए साहब कथित तौर पर एक-एक मामले को फूंक-फूंककर आगे बढ़ा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि जाते-जाते पुराने साहब कुछ ऐसे फैसलों और व्यवस्थाओं की विरासत छोड़ गए, जिनकी सफाई अब नए साहब के लिए आसान नहीं है। मजेदार बात यह है कि जिन पुराने साहब की ईमानदारी के किस्से कभी विभाग में खूब सुनाए जाते थे, अब उन्हीं के आखिरी दौर के कामों को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर विदाई से पहले ऐसा क्या हुआ कि नए साहब को पुरानी व्यवस्था संभालने में ही पसीना आ रहा है?
अब देखना यह है कि नए साहब झाड़ू चलाते हैं, फाइलों पर धूल झाड़ते हैं या फिर पुराने साहब की छोड़ी विरासत को जस का तस रहने देते हैं।
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