Politics: राजनीतिक हलचल: बॉउंड्रीवाल के बहाने नदी उल्टी बहाने की तैयारी क्यों?? तबादलों का तराजू और नेताओं का हिसाब, आखिर क्या है माजरा??? पार्षदों की एकजुटता से किस साहब ने खाई मुंह की???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक कोना में…..

बाउंड्रीवाल के बहाने नदी उल्टी बहाने की तैयारी!
राजनीति में कमेटियां बनना कोई नई बात नहीं, लेकिन इस बार तो कमाल ही हो गया। एक प्रमुख पार्टी ने बाउंड्रीवाल निर्माण जैसे मामूली काम के लिए भी बाकायदा कमेटी गठित कर दी। हैरत की बात यह है कि इस कमेटी में प्रदेश स्तर के पदाधिकारी को भी शामिल कर लिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब कमेटी जिला स्तर की है और उसकी जवाबदेही जिला अध्यक्ष के पास रहेगी, तो क्या प्रदेश पदाधिकारी को भी अपनी रिपोर्ट जिला अध्यक्ष को देनी पड़ेगी? अगर ऐसा है तो फिर संगठनात्मक व्यवस्था का नया गणित समझना पड़ेगा।
अब तक तो जिले वाले प्रदेश को रिपोर्ट करते थे, लेकिन यहां तो तस्वीर उल्टी नजर आ रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शायद पार्टी संगठन कोई नया प्रयोग कर रहा है, जिसमें नदी ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर नहीं बल्कि उल्टी दिशा में बहेगी। कार्यकर्ता भी हैरान हैं और नेता भी मुस्कुरा रहे हैं। फिलहाल इतना तो तय है कि बाउंड्रीवाल बनने से पहले इस कमेटी ने चर्चा की दीवार जरूर खड़ी कर दी है। धन्य है संगठन की यह अद्भुत माया, जहां प्रदेश वाले भी अब जिले की चौखट पर हाजिरी लगाते नजर आ सकते हैं!
तबादलों का तराजू और नेताओं का हिसाब-किताब
सत्तारूढ़ पार्टी के गलियारों में इन दिनों विकास, संगठन और जनहित से ज्यादा चर्चा तबादलों की चल रही है। कौन अधिकारी किसकी सिफारिश पर इधर से उधर हुआ, किसके कहने पर फाइल चली और किसकी बात को ज्यादा वजन मिला कि इन सबका बारीकी से लेखा-जोखा तैयार किया जा रहा है। खबर है कि कुछ नेता अपने-अपने स्कोर कार्ड बनाने में जुटे हैं।
मंडल अध्यक्ष से लेकर जिला अध्यक्ष और विधायक तक के नाम के आगे तबादलों की संख्या जोड़ी जा रही है। मानो कोई राजनीतिक प्रतियोगिता चल रही हो और अंत में ट्रॉफी उसी को मिलनी हो जिसके खाते में सबसे ज्यादा तबादले दर्ज हों। दिलचस्प बात यह है कि इस गणित में कुछ छूटभैये नेता भी पीछे नहीं हैं। वे भी अपने-अपने सूत्रों के आधार पर आंकड़े जुटा रहे हैं और मौका मिलते ही एक-दूसरे को किस्से-कहानियां सुनाने लगते हैं।
कोई दावा कर रहा है कि उसकी पकड़ सबसे मजबूत है, तो कोई बता रहा है कि फलां तबादला उसके एक फोन पर हो गया। अब इन दावों में कितना सच है और कितना राजनीतिक मसाला, यह तो वहीं जानें। लेकिन इतना जरूर है कि तबादलों के इस मौसम में नेताओं की राजनीतिक ताकत का आंकलन विकास कार्यों से नहीं, बल्कि तबादलों के आंकड़ों से किया जा रहा है।
पार्षदों की एकजुटता से साहब ने खाई मुंह की
एक निकाय के बेहद स्मार्ट और खुद को जरूरत से ज्यादा इंटेलीजेंट समझने वाले साहब को हाल ही में परिषद की बैठक में बड़ा सबक मिल गया। चर्चा है कि किसी शुभचिंतक ने साहब के कान में यह मंत्र फूंक दिया था कि सत्तारूढ़ दल के पार्षद बिखरे हुए हैं और उनकी आपसी खींचतान का फायदा आसानी से उठाया जा सकता है।बस फिर क्या था, साहब ने अपने बड़े फायदे से जुड़ा एक प्रस्ताव परिषद की बैठक में रख दिया। उन्हें पूरा भरोसा था कि पार्षदों की फूट के बीच प्रस्ताव आराम से पास हो जाएगा, लेकिन राजनीति में सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करना कभी-कभी भारी पड़ जाता है।
बैठक में जैसे ही प्रस्ताव सामने आया, पार्षद अचानक एकजुट हो गए। फिर क्या था, जिस प्रस्ताव को साहब अपनी मास्टर स्ट्रोक चाल समझ रहे थे, उसी पर जोरदार विरोध शुरू हो गया। नतीजा यह रहा कि स्मार्ट साहब का पूरा गणित गड़बड़ा गया और उन्हें सबके सामने मुंह की खानी पड़ गई। अब निकाय के गलियारों में चर्चा है कि साहब को समझ आ गया होगा कि राजनीति की बिसात पर हर खबर सही नहीं होती और पार्षदों की एकजुटता कब जाग जाए, इसका अंदाजा बड़े-बड़े रणनीतिकार भी नहीं लगा पाते।
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