Today Betul News:  प्रशासनिक एक्टिविटी की खबरें ना छपे तो लगे ही नहीं कि चुनाव हैं

Today Betul News: If news of administrative activity is not published then it does not seem like there are elections.

ना शोर ना शराबा, ना कोई हलचल, ना कोई प्रचार प्रसार

Today Betul News:  चुनावी सीजन के इतिहास में शायद यह पहला ऐसा मौका देखने को मिल रहा है जहां लोकसभा चुनाव नीरसता से भरा नजर आ रहा है। लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की काफी पहले ही घोषणा कर दी थी। लेकिन ना ही उम्मीदवार मैदान में दिख रहे ना ही पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ता। मजे की बात तो ये है कि सड़कों पर रिक्शे और वाहनों में लगे भोंपू का शोर तक सुनाई नहीं दे रहा। हां ये जरूर है कि निर्वाचन को लेकर यदि प्रशासनिक एक्टिविटी की खबरे अखबारों में ना छपे तो लगे ही नहीं कि लोकसभा का चुनाव भी हो रहा है।

चुनाव देखा तो केवल विधान सभा का

चुनाव को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्मी के तापमान से भी ज्यादा तपता नजर रहा है। हर तरफ एक ही चर्चा सुनने में आ रही है कि, चुनाव देखा तो केवल विधान सभा का। जहां चारों तरफ घूमते भोंपुओं का शोर सुबह से रात तक सुनाई दे रहा था तो शाम होते ही गली मोहल्लों में जेब गर्म कर झूमते समर्थक देर रात तक अपने प्रत्याशियों के गुणगान करते दिखाई देते थे। यही नहीं आर्थिक जुगाड़ को लेकर भी लोग पूरी तरह तृप्त नजर आ रहे थे।

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है का जुमला हर किसी की जुबां से सुना जा रहा था। सब कामधाम छोड़कर बस एक ही काम पर पूरा ध्यान लगा दिया गया था कि कौनसी पार्टी किस तरह लोगों को उपकृत कर रही हैऔर किसी तरह संपर्क स्थापित हो जाये । लेकिन ये सब इस चुनाव से पूरी तरह नदारद नजर आ रहा है। लोग इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं की आखिर इसकी वजह क्या है।

उम्मीद लगाए घरों में कैद मायूस कार्यकर्ता

अक्सर देखने मे आता है कि चुनाव नजदीक आते ही एक उम्मीद लिए कार्यकर्ताओं की बाढ़ उम्मीदवारों के घरों के आसपास बड़े पैमाने पर नजर आने लगती है। लेकिन मौजूदा हालात बता रहे हैं कि कार्यकर्ता भी बाहर निकलने अवसर खोज तो रहे हैं लेकिन उन्हें इसका कोई ओर छोर नजर नहीं आ रहा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि ये सब विधान सभा चुनावों का असर है। विधान सभा चुनावों में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा था।

सुरा की महफिलें रोजाना सज रही थी। जरूरत की दुकाने फुल शबाब पर चल रही थीं। लेकिन इस चुनाव में अभी तक ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। कार्यकर्ता घरों में बैठकर इंतजार कर रहे हैं कि उम्मीदों का पिटारा खुले तो वे भी मैदान में उतरे लेकिन अभी तक कार्यकर्ता अपने आकाओं के भरोसे का इंतजार ही कर रहे हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव नीरसता से सराबोर नजर आ रहा है।

प्रशासन चुस्त पार्टियां सुस्त

राजनीतिक समीक्षक भी इस बात से चिंतित हैं कि भारत के इतिहास में यह पहला मौका देखने को मिल रहा है कि चुनाव जैसा चुनाव कहीं दिख ही नहीं रहा।राजनीतिक दल जहां शून्य नजर आ रहे हैं तो निर्वाचन की जिम्मेदारी का प्रशासन ईमानदारी से पालन कर रहा है। रोजाना प्रशिक्षण, निरीक्षण, नामांकन, व्यवस्थाएं, मतदान आदि की खबरें समाचार पत्रों में देखकर लग रहा कि चुनाव चल रहे हैं।

लेकिन राजनीतिक दलों का प्रचार प्रसार कहाँ चल रहा, कहाँ सभाएं हो रही ,कहाँ जनसम्पर्क किया जा रहा इसकी खबरें समाचार पत्रों में ना देखने को मिल रही ना पढ़ने को कुल मिलाकर आने वाले दिनों में भी चुनाव परवान चढ़ पायेगा या नहीं इसको लेकर आम लोगों में खासी असमंजस की स्थिति देखने को मिल रही है।

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Ankit Suryawanshi

मैं www.snewstimes.com का एडिटर हूं। मैं 2021 से लगातार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम कर रहा हूं। मुझे कई बड़ी वेबसाइट पर कंटेंट लिखकर गूगल पर रैंक कराए हैं। मैने 2021 में सबसे पहले khabarwani.com, फिर betulupdate.com, sanjhveer.com, taptidarshan.com, betulvarta.com, yatharthyoddha.com पर काम करने का अनुभव प्राप्त हैं।इसके अलावा मैं 2012 से पत्रकारिता/मीडिया से जुड़ा हुआ हूं। प्रदेश टुडे के बाद लोकमत समाचार में लगभग 6 साल सेवाएं दीं। इसके साथ ही बैतूल जिले के खबरवानी, प्रादेशिक जनमत के लिए काम किया।

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