Prashasnik Kona: प्रशासनिक कोना: रेस्ट हाउस में जब्ती का खेल, 50 में सेटिंग का मेल….! जरा सी चूक से कौनसे साहब घर के रहे न घाट के??? हजार की पान- प्रसादी औऱ न्याय का स्वाद, आखिर क्या माजरा है???? विस्तार अब पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम प्रशासनिक कोना में…..

रेस्ट हाउस में जब्ती का खेल, 50 में सेटिंग का मेल
बैतूल में इन दिनों एक साहब की कार्यशैली फिर सुर्खियों में है। हरे-भरे विभाग के ये क्षेत्रीय अधिकारी पहले भी अपने कारनामों से चर्चा बटोर चुके हैं, और इस बार मामला कुछ ज्यादा ही हरियाली से भरा नजर आ रहा है।
ताज़ा घटनाक्रम में जब्ती की एक कार्रवाई ने पूरे महकमे में कानाफूसी का बाजार गर्म कर दिया है। कहानी कुछ यूं है कि सूचना मिलते ही साहब ने फुर्ती दिखाई और अपने स्टाफ को तलाशी वारंट थमाकर मौके पर रवाना कर दिया। स्टाफ ने भी मौके पर पहुंचकर जमकर ‘मेहनत’ की और बड़े पैमाने पर माल जब्त कर लिया।
लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ। नियम कहता है कि जब्त सामग्री सीधे कार्यालय पहुंचे, लेकिन यहां तो रास्ता ही बदल गया। माल दफ्तर की बजाय सीधे एक रेस्ट हाउस में उतार दिया गया। थोड़ी देर बाद साहब भी वहां पहुंच गए। फिर क्या था।
दरवाजे बंद, बातचीत शुरू, और आखिरकार 50 में मांडवली’ तय हो गई। आधा माल वापस, आधा अपने पास और मामला सेट! चर्चा है कि मौके पर कार्रवाई के दौरान पहले माल ‘ढूंढ-ढूंढकर’ बाहर निकाला गया और बाद में कागजी खानापूर्ति के लिए तलाशी वारंट पर हस्ताक्षर कराए गए। जबकि नियम साफ कहता है कि सबसे पहले वारंट की तामीली जरूरी होती है, लेकिन यहां नियम किताबों में ही अच्छे लगते हैं, ज़मीनी हकीकत में नहीं। खैर, साहब का अंदाज़ तो शुरू से ही निराला रहा है ‘ना सावन हरे, ना भादो सूखे।’ अब देखना यह है कि यह मामला भी बाकी किस्सों की तरह ठंडे बस्ते में जाता है या फिर कभी किसी फाइल में हरियाली दिखाता।
साहब घर के रहे न घाट के
शासन को तगड़ा राजस्व दिलाने वाले एक अधिकारी पिछले दिनों शासन के निलंबन का शिकार हो गए। उनकी गलती इतनी थी कि दुकानों को कचरा करते हुए ग्रुपों में बांट दिया। इसके बाद भी वे शेष बची डेढ़ दर्जन दुकानों की नीलामी करने में सफल नहीं रह सके।
इसे शासन ने गंभीरता से लेते हुए निलंबन की कार्रवाई कर दी। साहब को पुराने सिंडीकेट के हिसाब से ग्रुप तोडऩा महंगा पड़ गया है, यह बात ऊपर बैठे आयुक्त को समझ आ गई। अब निलंबन के बाद वे अदालत का दरवाजा खटखटाने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी है। कहा जा रहा है कि वे बिना तारीख दिए वापस लौट आए। उनका शहर में वापस आना चर्चा का विषय है।
हजार की पान-प्रसादी और न्याय का स्वाद
बैतूल में इन दिनों न्याय भी मिठास के साथ परोसा जा रहा है। फर्क बस इतना है कि मिठाई की जगह यहां हजार की पान-प्रसादी’ चल रही है। जनाब, मामला कुछ यू है कि शिकायत करो तो कार्रवाई होगी, कार्रवाई होगी तो जांच होगी… और जांच के बाद असली रस्म चालान पेशी आएगी। अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है?
नया ये है कि इस रस्म में दोनों पक्षों को बराबरी का हक दिया गया है। न्याय के तराजू में संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों से एक-एक हजार रुपये की श्रद्धा-राशि अनिवार्य कर दी गई है।
कहते हैं कि जांच अधिकारी बड़े अदब से बुलावा भेजते हैं। आइए, आपका चालान पेश करना है और जब आप पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि यह सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आर्थिक अनुष्ठान’ भी है। बिना चढ़ावे के फाइलें शायद आगे बढऩे में शर्माती हैं। अगर कोई भोला-भाला नागरिक हिम्मत करके पूछ ले साहब, ये फीस किस बात की तो जवाब भी तैयार है।
ऊपर जवाब देना पड़ता है। यानी व्यवस्था ऐसी है कि नीचे से ऊपर तक प्रसाद की श्रृंखला बनी हुई है। अब आम आदमी करे तो क्या करे? शिकायत करे तो जेब ढीली, ना करे तो समस्या जस की तस।
न्याय की इस नई परंपरा ने लोगों को ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ सही और गलत से ज्यादा अहम सवाल है हजार तैयार हैं या नहीं? कहने को तो यह कानून-व्यवस्था का मामला है, लेकिन हालात देखकर लगता है कि कहीं यह ‘पान-प्रसादी विभाग’ तो नहीं बन गया। फिलहाल बैतूल में न्याय का स्वाद लेने के लिए जेब में कम से कम एक हजार रुपये का ‘मसाला’ रखना जरूरी हो गया है। वरना आपकी फाइल भी शायद बिना चटकारे के ही पड़ी रह जाए।
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