Betul Samachar: छिंदवाड़ा- मंडला में 30 लाख के गबन पर एफआईआर, बैतूल 2 करोड़ के बाद कार्यवाही शून्य

विवेक तिवारी के नाम किस मद में किया गया 84 हजार 711 का भुगतान!
Betul Samachar: बैतूल। पश्चिम वन मंडल में फर्जी भुगतानों के माध्यम से 2 करोड़ 13 लाख 95 हजार रुपए के कथित घोटाले का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा। कोष एवं लेखा आयुक्त द्वारा उठाई गई गंभीर आपत्तियों के बावजूद जांच प्रतिवेदन में सभी भुगतानों को ओके बताया जाना विभाग में चर्चाओं का विषय बना हुआ है। विभागीय सूत्रों का दावा है कि जांच अधिकारियों को प्रभावित कर पूरा प्रकरण पलट दिया गया, जिसमें कर्मचारियों के साथ कुछ उच्च अधिकारियों की मिलीभगत की चर्चा भी जोरों पर है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह कि विवेक तिवारी नामक व्यक्ति के खाते में किए गए 84,711 रुपए के भुगतान पर आयुक्त ने स्पष्ट आपत्ति दर्ज की थी और भुगतान का आधार मांगा था। लेकिन हालिया जांच रिपोर्ट में इस भुगतान सहित कुल 662 संदिग्ध भुगतानों में से एक भी भुगतान फर्जी नहीं पाया गया, जो मामले को और भी संदिग्ध बना रहा है।
84 हजार के भुगतान सहित 662 बाउचरों पर उठी शंका, कार्रवाई शून्य
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कोष एवं लेखा आयुक्त ने शिकायत पत्र में न केवल विवेक तिवारी के नाम किए गए भुगतान की जानकारी मांगी थी, बल्कि बाकी 662 भुगतानों पर भी अनियमितताओं के स्पष्ट संकेत दर्ज किए थे। अंदरखाने की चर्चाओं के अनुसार रातोंरात बाउचरों की राशि में बदलाव किए गए, नए बाउचर तैयार किए गए,और पुराने बाउचरों को नष्ट कर दिया गया। ऐसी स्थिति में जांच रिपोर्ट में सभी भुगतान सही पाए जाना विभाग के भीतर ‘सेटिंग और मैनेजमेंटÓ की चर्चा को और हवा दे रहा है।
छिंदवाड़ा में 30 लाख के गबन पर ईओडब्ल्यू की कार्रवाई
गौरतलब है कि इससे पहले छिंदवाड़ा जिला वन वृत में भी इसी तरह की अनियमितताओं का मामला सामने आया था, जिसमें केवल 30 लाख के फर्जी भुगतान पाए जाने पर ईओडब्ल्यू ने एसडीओ, दो रेंजर और अन्य लोगों पर एफआईआर दर्ज कराई थी। मंडला जिले में भी ऐसा ही प्रकरण दर्ज किया जा चुका है। इसकी तुलना में बैतूल का मामला राशि और दायरे दोनों में कई गुना बड़ा बताया जा रहा है, लेकिन यहां जांच किसी अन्य एजेंसी को न सौंपे जाने की वजह से कार्रवाई संदिग्ध मानी जा रही है।
अब गेंद कोष एवं लेखा आयुक्त के पाले में
सूत्रों का कहना है कि यदि बैतूल के पश्चिम वन मंडल की जांच ईओडब्ल्यू या स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाती, तो यह घोटाला करोड़ों तक पहुंचकर कई बड़े नामों को बेनकाब कर सकता था। फिलहाल विभागीय जांच रिपोर्ट के बाद मामला फिर से कोष एवं लेखा आयुक्त के पाले में आ गया है। अब आगे की कार्रवाई पर सबकी नज़रें टिक गई हैं कि क्या इस प्रकरण पर कानूनी कार्यवाही होगी या कथित सेटिंग के सहारे पूरा मामला हमेशा के लिए दफन कर दिया जाएगा। वन विभाग के इस प्रकरण ने जिले में ही नहीं बल्कि प्रदेश में भी भ्रष्टाचार और भुगतान के नाम पर विभागीय खेल का नया अध्याय खोल दिया है। अब देखना यह है कि 2.13 करोड़ के फर्जी भुगतान पर अगला कदम क्या होता है।




