Betul Samachar: स्थिति बिगड़ी तो सीएस-आरएमओ का दिखावटी निरीक्षण!

हकीकत: दोनों को अस्पताल का जिम्मा, लेकिन महीनों तक नहीं होता निरीक्षण, प्रभारी मंत्री की नाराजगी के बाद आई जिम्मेदारी याद, विधायक के मनोनीत प्रतिनिधि भी महीनों से नहीं पहुंचे सुध लेने….
Betul Samachar: बैतूल। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जिला मुख्यालय के ए ग्रेड के जिला अस्पताल की जिम्मेदारी सिविल सर्जन के साथ आरएमओ को है, वे रोज यहां आते हैं। अपने कार्यालय में बैठकर चर्चाएं होती हैं, मरीजों की व्यवस्थाओं को लेकर रणनीति बनती है, लेकिन व्यवस्थाएं धरातल पर उतर रही है या नहीं? इसको लेकर निरीक्षण करने की बारी आती है तो दोनों ही अधिकारी पीछे क्यों हट जाते? यह सवाल कई तरह के सटीक उत्तरों का इंतजार कर रहा है।
वह तो शुक्र है कि एक मरीज की मौत के बाद परिजनों के प्रदर्शन पर प्रभारी मंत्री को जिला अस्पताल पहुंचना पड़ा, तब फटकार के बाद सिविल सर्जन डॉ जगदीश घोरे और डॉ रानू वर्मा को दिखावटी निरीक्षण कर प्रेस नोट जारी करवाना पड़ा। इसके पहले वे न तो अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए वार्डों का निरीक्षण करने पहुुंचे और न माकुल व्यवस्था बनाने का कोई प्रयास किया।
जिला अस्पताल में आए दिनों विवाद की स्थिति बन रही है। इसके पीछे मरीजों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन अपनी व्यवस्थाओं को 100 में से 100 अंक देकर अधिकारियों के सामने पीठ थपथपाते आ रहा है। दरअसल जिला अस्पताल में अधिकारी तो बदल गए है , लेकिन यहां की व्यवस्थाएं नहीं बदल पा रही है। लंबे समय से ऐसे तेज तर्रार सिविल सर्जन की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसका नियंत्रण पूरे अस्पताल पर हो और मरीजों को होने वाली समस्या-तकलीफों का तत्काल समाधान हो जाए। वर्षों से ऐसे सिविल सर्जन की तलाश में न तो जनप्रतिनिधियों को सफलता मिली है और न ही उन अधिकारियों को जिन्हें यहां माकुल व्यवस्थाएं बनाना है। हालात ऐसे होते जा रहे हैं कि आए दिनों मरीज ही डॉक्टरों के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। इस बारे में किसी ने ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं की। यही वजह है कि स्थिति लगातार बिगड़ते जा रही है।
डॉक्टरों की तरह राउंड मारने में क्या परेशानी?
हैरानी वाली बात यह है कि दो दिनों से जनसंपर्क कार्यालय से प्रेसनोट जारी हो रहे हैं। इसमें बताया जा रहा है कि सिविल सर्जन और आरएमओ द्वारा जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया गया। पहले प्रेसनोट में बताया गया कि सिविल सर्जन डॉ घोरे और आरएमओ ने जिला अस्पताल की विभिन्न शाखाओं का निरीक्षण किया। इस दौरान पैथालाजी, सोनोग्राफी लैब, एएनसी, पीएनसी वार्ड में खामियां मिली। सिविल सर्जन ने सभी को कारण बताओ नोटिस जारी करवाया।
दूसरे दिन भोजन शाला के निरीक्षण में खामियां उजागर होने का दावा किया गया और यहां पर गंदगी मिलने पर सुपरवाइजर को फटकार लगाने के अलावा भोजन की गुणवत्ता को सुधारने के निर्देश दिए। दोनों ही मामले में सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब दोनों अधिकारियों के जिम्मे अस्पताल है तो प्रभारी मंत्री की नाराजगी के बाद व्यवस्था सुधारने क्यों निकले? इसके पहले दोनों अधिकारी अस्पताल पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पाए? लोगों का सवाल है कि पद पाने के लिए दोनों जिम्मेदार लॉबिंग क्यों कर रहे थे? इन प्रश्रों ने अस्पताल प्रबंधन के साथ अधिकारियों की जिम्मेदारी पर और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिन्हें बनाया प्रतिनिधि, वह महनों से नहीं पहुंचे
जिला अस्पताल में आए दिनों अव्यवस्थाओं और लापरवाही की शिकायतों की निगरानी के लिए बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल ने पूर्व सिविल सर्जन डॉ अशोक बारंगा को करीब एक वर्ष पहले जिला अस्पताल के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। नियुक्ति के बाद वे एन-केन मौकों पर ही अस्पताल में शासकीय कार्यक्रम में शामिल होते दिखाई दिए। एक मर्तबा जरूर सुना गया था कि उन्होंने अस्पताल का निरीक्षण किया। इसके बाद विधायक प्रतिनिधि डॉ बारंगा ने कई बार व्यवस्थाएं चरमराने, स्थिति नियंत्रण के बावजूद अपनी जिम्मेदारी शिद्दत से नहीं निभाई।
लोग सवाल कर रहे हैं कि जब उन्हें अस्पताल की निगरानी की जिम्मेदारी दी है तो वे निरीक्षण करने के अलावा यहां की बैठकों में शामिल होकर मिली खामियों को विधायक तक पहुंचाने में असफल रहे। इसी वजह अस्पताल की व्यवस्था बैकफुट पर दिखाई दे रही है। इस संबंध में सीएस डॉ जगदीश घोरे को चार मर्तबा उनके मोबाइल 942563611 पर कई बार काल किया, लेकिन अवकाश पर होने का हवाला देकर प्रभारी सीएस डॉ रूपेश पदमाकर से चर्चा करने का मैसेज भेज दिया।




