Betul News: अधिकारियों के हितों के बोझ तले दबी कम्प्यूटर ऑपरेटरों पर कार्रवाई!
Betul News: Action taken against computer operators burdened by the interests of officers!

वन विभाग में गंभीर प्रशासनिक अनदेखी, शासन स्तर पर जांच की तैयारी
Betul News: बैतूल। वन विभाग में लंबे समय से पदस्थ कम्प्यूटर ऑपरेटरों पर कार्रवाई के आदेशों के बावजूद विभागीय अधिकारियों द्वारा में कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाए गए हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो इस निष्क्रियता के पीछे कुछ उच्च अधिकारियों के स्वहित और दबाव की भूमिका सामने आ रही है, जिसके चलते एक स्पष्ट निर्देश भी हवा-हवाई बनकर रह गया है। सूत्र बताते हैं कि शिकायते मिलने के बाद तत्कालीन मुख्यवनसंरक्षक पीजी फुलझेले ने अपने स्तर पर ईस पूरे मामले की जांच कराई थी। जिसके बाद ही उन्होंने फर्जी कार्यों में लिप्त आपरेटरों को बाहर का रास्ता दिखाए जाने के निर्देश दिये थे।लेकिन मामला सामने आने के बाद अधिकारियों से अब ना निगलते बन रहा है, ना उगलते।
कनिष्ठ अधिकारी ने निर्देशों को ही कर दिया चैलेंज
जानकारी के अनुसार, वन वृत्त के अंतर्गत कार्यरत कुछ कम्प्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ कई प्रकार की अनियमितताओं की शिकायतें तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक के संज्ञान में लाई गयी थीं। आपरेटरों पर लंबे समय से , कार्यप्रणाली में लापरवाही, और कुछ मामलों में कथित आर्थिक लेन-देन में संलिप्तता के आरोप लगे थे। इन शिकायतों के आधार पर ही वरिष्ठ अधिकारी ने सख्त निर्देश दिए थे कि इन ऑपरेटरों को तत्काल पद से पृथक किया जाए, लेकिन विभाग के ही एक कनिष्ठ अधिकारी का कहना है कि, उन्होंने निर्देश का पालन करने के पहले मुख्य वन संरक्षक को पत्र लिखकर शिकायतों का ब्यौरा मांगा था।
सूत्रों के अनुसार, शिकायतें प्राप्त नहीं होने का हवाला देकर उन्होंने कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया। कनिष्ठ अधिकारी का यह कृत्य न सिर्फ उच्चाधिकारी के आदेश की अवहेलना है, बल्कि एक तरह से उस आदेश को चुनौती देने जैसा है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि किसी भी विभाग में उच्चाधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना प्रशासनिक शिष्टाचार और अनुशासन के खिलाफ है। ऐसे कृत्य को गंभीर कदाचरण की श्रेणी में रखा जाता है, जिसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
समझौता और स्व हितों की राजनीति का होगा पर्दाफाश
मामले में यह भी सामने आया है कि विभाग में वर्षों से जमे हुए कुछ कम्प्यूटर ऑपरेटर कथित रूप से कुछ अधिकारियों के हितों के अनुरूप काम करते रहे हैं, जिससे उनके खिलाफ कार्रवाई टलती रही है। यही कारण है कि शिकायतों के बावजूद उनके खिलाफ कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब इस पूरे प्रकरण की शिकायत शासन स्तर पर पहुंच रही है और मामले की उच्च स्तरीय जांच की तैयारी की जा रही है। शासन स्तर पर यदि जांच शुरू होती है, तो यह सम्भव है कि विभाग में वर्षों से चले आ रहे समझौता और हितों की राजनीति का पर्दाफाश हो जाएगा।
कुल मिलाकर यह मामला न सिर्फ विभागीय निष्क्रियता और पक्षपात का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे अधिकारियों के व्यक्तिगत हित, पारदर्शिता और न्याय के रास्ते में बाधा बनते हैं। अगर शासन ने इस बार निष्पक्ष जांच कराई, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं और वर्षों से दबे फाइलों के राज सामने आ सकते हैं।




