Lok Sabha Elections : बैतूल में तीसरी शक्ति का उदय नहीं
Lok Sabha Elections: No third power emerges in Betul

भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला, हर चुनाव में दूसरी पार्टियों की जमानत हो रही जब्त
Lok Sabha Elections : बैतूल। परिसीमन के बाद वर्ष 2009 में अनुसूचित जन जाति वर्ग के लिए आरक्षित हुई बैतूल-हरदा-हरसूद लोकसभा सीट पर तीसरी शक्ति यानी तीसरी पार्टी का उदय नहीं हो पा रहा है। मसलन यह स्थिति लोकसभा के अनारक्षित होने के समय भी थी। केवल एक मर्तबा एमएच बूच निर्दलीय चुनाव लड़े थे, तब उन्होंने निर्दलीय होने की ताकत से भाजपा-कांग्रेस को अवगत कराया था। इसके बाद से भाजपा और कांग्रेस में ही हर चुनाव में मुकाबला होते आया है। शेष प्रत्याशियों की जमानत जब्त होते आ रही है।
आजादी के बाद से कांग्रेस वर्ष 1977 तक हमेशा काफी मजबूत रही। इसी पार्टी के सांसदों का लोकसभा में राज दिखाई दिया। 1980 में जरूर जनता पार्टी ने देश की तरह बैतूल में परचम लहराया था, तब सुभाष आहूजा ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर कांग्रेस को करारी मात दी थी। हालांकि जनता पार्टी का बाद में भाजपा में विलय हो गया। इसके बाद कांग्रेस को यदि किसी ने टक्कर दी तो वह भाजपा ही थी। इस वर्ष के बाद बैतूल में भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला होते आया है। भले ही कांग्रेस जीती या भाजपा, दोनों में से ही किसी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत जब्त नहीं हुई है।
आरक्षित होने के बाद बड़ा भाजपा का दबदबा
वर्ष 2009 में परिसीमन के बाद बैतूल सामान्य सीट को आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित कर दिया है। ज्योति धुर्वे भाजपा से दो बार सांसद चुनी गई। वर्ष 2019 मेें तीसरी मर्तबा भाजपा ने डीडी उइके को प्रत्याशी बनाया तब उन्होंने कांग्रेस के रामू टेकाम को रिकार्ड 3 लाख 59 हजार वोटों से पराजित कर इतिहास रच दिया। यह संसदीय क्षेत्र में अब तक की सबसे बड़ी जीत मानी जाती है। यानी परिसीमन के बाद बैतूल-हरदा-हरसूद लोकसभा सीट पर भाजपा का दबदबा काफी बढ़ गया है।
कांग्रेस कमजोर, लेकिन जमानत बचाने में कामयाब
राजनीति आंकलन किया जाए तो बैतूल-हरदा-हरसूद सीट पर पिछले सात लोकसभा चुनाव से भाजपा का अभेद गढ़ बन गई है। वर्ष 1989 में कांग्रेस के असलम शेरखान को जीत मिली थी। इसके बाद हुए चुनावों में 1996 से लेकर 98, 99,2004, 2008 के उपचुनाव, 2009, 2014, 2019 में भाजपा के सांसद चुने गए। हालांकि हर बार कांग्रेस की बुरी हार हुई, लेकिन उसके परंपरागत वोट बैंक बना रहा। इसी वजह जमानत जब्त होने की नौबत नहीं आई।
सपा-बसपा की स्थिति बदत्तर, आप बेदम
जिले में कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरी पार्टी का प्रदेश के अन्य जिलों की तरह उदय नहीं हो पाया है। इतना जरूर है कि मुलताई में डॉ सुनीलम दो बार निर्दलीय चुनाव लड़े, लेकिन बाद में उन्होंने सपा का दामन थाम लिया। हालांकि सपा से वे टिकट नहीं मांग सके।
बसपा की बात करें तो जिले में पार्टी दस वर्ष पहले मजबूत जनाधार वाला वोट बैंक था, लेकिन तीसरी शक्ति नहीं बन पाई। अब सपा के साथ बसपा की ऐसी स्थिति नहीं है कि कांग्रेस-भाजपा से मुकाबला कर सके। रही बात आप की तो संसदीय क्षेत्र में बेदम दिखाई दे रही है। आपसी गुटबाजी के कारण आप जिले में एक पार्षद का चुनाव भी नहीं जीत पाई, इसलिए कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होते आया है।





