Friendship Day: न चेहरा देखा, न मिले: फिर भी 32 साल की दोस्ती मिसाल

बैतूल के उत्तराखंड तक पत्रों में जिंदा है इनकी दोस्ती
Friendship Day: बैतूल। कुछ रिश्ते खून से नहीं, एहसासों से बनते हैं। कुछ दोस्तियां मुलाकातों की मोहताज नहीं होतीं। और कुछ इंतजार ऐसे होते हैं, जो वर्षों बीत जाने के बाद भी खत्म नहीं होते। बैतूल के सादिक शाह और उत्तराखंड के जोध सिंह नेगी की दोस्ती ऐसी ही एक मिसाल है, जो 32 वर्षों से समय, दूरी और परिस्थितियों की हर परीक्षा में खरी उतरी है।
हैरानी की बात यह है कि तीन दशक से भी अधिक समय से एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बने ये दोनों दोस्त आज तक आमने-सामने नहीं मिल सके हैं। फिर भी उनके बीच अपनापन ऐसा है, मानो बरसों से साथ रह रहे हों। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लगती है। फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्मों में बिछड़े लोग अंत में मिल जाते हैं, लेकिन सादिक और जोध की दोस्ती आज भी उस एक मुलाकात की राह देख रही है।
दोस्त बनाओ स्तंभ में हुई चर्चा
साल 1994। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का दौर नहीं था। बैतूल के सादिक शाह को पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने और लिखने का शौक था। एक पत्रिका में प्रकाशित ‘दोस्त बनाओÓ स्तंभ में उन्होंने अपना परिचय भेजा। उसी स्तंभ के जरिए उत्तराखंड के जोध सिंह नेगी का पत्र उनके पास पहुंचा। एक अनजान नाम से शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे विश्वास, आत्मीयता और गहरी मित्रता में बदल गई।
फिर शुरू हुआ पत्रों का सिलसिला। पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और शुभकामना संदेशों के माध्यम से दोनों एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा बन गए। परिवार की खुशियां हों या कठिन समय, दोनों ने हर पल एक-दूसरे का साथ निभाया। जब यह दोस्ती शुरू हुई थी, तब जोध सिंह नेगी पढ़ाई कर रहे थे। आज वे डाक विभाग में कर्मचारी हैं। वहीं सादिक शाह बैतूल में बेकरी व्यवसाय संचालित कर रहे हैं। समय के साथ जीवन बदला, जिम्मेदारियां बढ़ीं, परिवार बढ़े, लेकिन दोस्ती की डोर कभी कमजोर नहीं हुई।
सादिक बताते हैं कि कई बार ऐसा लगा कि अब मुलाकात हो जाएगी। कभी उन्होंने उत्तराखंड जाने की योजना बनाई, तो कभी नेगी ने आने की इच्छा जताई। लेकिन हर बार परिस्थितियां ऐसी बनीं कि मुलाकात टलती चली गई। देखते ही देखते 32 साल गुजर गए।
एक खत का और इंतजार
इन दिनों सादिक के मन में एक और इंतजार है। उत्तराखंड में भूस्खलन की घटनाओं के बाद उन्होंने अपने दोस्त की कुशलक्षेम जानने के लिए एक पत्र लिखा था। उस खत का जवाब अब तक नहीं आया है। वे रोज उम्मीद करते हैं कि शायद आज कोई पत्र आएगा और उसमें दोस्त की सलामती की खबर होगी।
सादिक की आवाज भर्रा जाती है जब वे कहते हैं, ‘दोस्ती आज भी पहले जैसी है। फोन पर बात हो जाती है, लेकिन खत का अपना अलग एहसास होता है। मैं जिंदगी में एक बार अपने दोस्त से जरूर मिलना चाहता हूं। 32 साल का यह रिश्ता एक मुलाकात का हकदार है।
मित्रता दिवस पर सादिक और जोध की कहानी उस दौर की याद दिलाती है, जब रिश्ते इंटरनेट से नहीं, इंसानी भावनाओं से बनते थे। जब दोस्ती लाइक और फॉलो से नहीं, बल्कि इंतजार, विश्वास और हाथ से लिखे गए खतों से जिंदा रहती थी। शायद यही वजह है कि 32 साल बाद भी बैतूल में बैठा एक दोस्त आज भी अपने मित्र के खत और उस बहुप्रतीक्षित मुलाकात का इंतजार कर रहा है।
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