Stamp Shulk : स्टाम्प शुल्क चोरी के मामलों में वसूली ठप, सुस्त कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान

32 आरआरसी प्रकरणों में 62 लाख से अधिक बकाया लंबित, 2009-10 के पुराने मामलों में भी नहीं हो सकी वसूली
Stamp Shulk: बैतूल। जिला पंजीयन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। संपत्ति पंजीयन के दौरान स्टाम्प शुल्क की चोरी कर शासन को राजस्व का नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में वर्षों बाद भी वसूली नहीं हो सकी है। स्थिति यह है कि विभाग के पास आरआरसी (रिकवरी रिक्वेस्ट सर्टिफिकेट) के 32 प्रकरण लंबित पड़े हैं, जिनमें कुल 62 लाख 24 हजार रुपए से अधिक की राशि बकाया है।
यह सभी मामले वर्ष 2009 और 2010 के बीच के बताए जाते हैं, यानी डेढ़ दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी विभाग इन मामलों को अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा पाया है।
सबसे गंभीर बात यह है कि इतने पुराने प्रकरणों में भी विभाग की वसूली प्रक्रिया बेहद धीमी और निष्क्रिय नजर आती है। जहां एक ओर राजस्व वसूली शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, वहीं जिला पंजीयन कार्यालय की कार्यशैली में इस दिशा में गंभीरता की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। विभागीय स्तर पर केवल औपचारिक नोटिस जारी करने तक ही कार्रवाई सीमित बताई जा रही है, जबकि जमीनी स्तर पर प्रभावी वसूली अभियान का अभाव साफ झलकता है।
धीमी कार्रवाई से राजस्व का तगड़ा नुकसान
सूत्रों के अनुसार, इन लंबित आरआरसी प्रकरणों में से तीन मामलों में तो हाईकोर्ट से स्टे भी मिल चुका है, जिनमें करीब 42 लाख 24 हजार रुपए की बड़ी राशि शामिल है। ऐसे में विभाग की लापरवाही और धीमी कार्रवाई ने न केवल वसूली प्रक्रिया को बाधित किया है, बल्कि शासन के राजस्व को भी बड़ा नुकसान पहुंचाया है।
गौरतलब है कि पहले उप पंजीयक कार्यालयों में बकायादारों की सूची सार्वजनिक रूप से चस्पा की जाती थी, जिससे पारदर्शिता बनी रहती थी और दबाव में आकर कई मामलों में वसूली भी हो जाती थी। लेकिन वर्तमान में यह व्यवस्था लगभग बंद हो चुकी है। न तो बकायादारों की सूची सार्वजनिक की जा रही है और न ही कोई विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिससे वसूली की गति और भी धीमी पड़ गई है।
विभागीय अधिकारियों की निष्क्रियता पर उठे कई सवाल
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी आम है कि जिम्मेदार अधिकारी इन गंभीर मामलों को लेकर अपेक्षित रुचि नहीं दिखा रहे हैं। लंबे समय से लंबित इन प्रकरणों को लेकर विभाग की निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने वर्षों बाद भी वसूली क्यों नहीं हो सकी। राजस्व से जुड़े मामलों में इस तरह की ढिलाई न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि निगरानी और जवाबदेही की कमी किस स्तर तक बनी हुई है।
यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जाती तो करोड़ों के राजस्व की वसूली संभव थी। अब देखना यह होगा कि जिला पंजीयन विभाग इन लंबित आरआरसी प्रकरणों को गंभीरता से लेकर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर यह फाइलें इसी तरह वर्षों तक धूल फांकती रहेंगी और राजस्व को नुकसान पहुंचता रहेगा।
इनका कहना….
ऐसे प्रकरण लगातार चलने वाली प्रक्रिया के अंतर्गत आते हैं। वसूली नहीं होने की स्थिति में प्रकरण आरआरसी में आ जाते हैं। समय समय पर वसूली होती रहती है।
दिनेश कौसले, रजिस्टार, बैतूल




