Politics: राजनीतिक हलचल: नेताजी के थाना घेरने की धमकी का क्या हुआ?? जिला कार्यकारिणी को लेकर विरोध के स्वर कैसे मुखर हुए??? फूलछाप कांग्रेसियों की यह कैसी जुगलबंदी???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में…..

नेता जी की थाना घेरने की धमकी का असर
पवित्र नगरी की फिजाओं में इन दिनों भक्ति से ज्यादा ‘पान और प्रतिष्ठा’ की खुशबू तैर रही है। मामला छोटा था,सिर्फ 25 हजार के लेनदेन का, लेकिन किरदार बड़े थे, तो कहानी भी अपने आप मसालेदार बन गई। एक तरफ पान की गुमटी सजाने वाले सक्रिय भाजपा नेता जी,और दूसरी ओर थाने के टीआई साहब। फिर क्या था, बात बढ़ी और सीधी थाने के भीतर जा पहुंची।
चर्चा है कि थाने में पहले तो शब्दों के तीर चले, फिर आवाजें ऊंची हुईं और माहौल ऐसा बना मानो अभी घेराव की पटकथा लिखी जाएगी। खबर फैलते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। ‘घेराव’ की तैयारी की सुगबुगाहट ने मसाले में और तडक़ा लगा दिया, लेकिन जैसे हर कहानी में एक ‘क्लाइमैक्स टालने वाला’ किरदार होता है, वैसे ही यहां भाजपा के कुछ समझदार नेताओं ने एंट्री ली और अपने ही अंदाज में सबको ठंडा कर दिया।
घेराव का ड्रामा शुरू होने से पहले ही ‘इंटरवल’ हो गया। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। अगले दिन टीआई साहब का दिल भी पिघला या फिर माहौल हल्का करने का मन हुआ और उन्होंने खुद नेताजी को फोन मिलाया। उधर से आवाज आई, क्यों भाई, पान नहीं खिलाओगे?
बस, यही एक लाइन अब पूरे शहर में ‘टॉप ट्रेंड’ बन चुकी है। अब इस पूरे घटनाक्रम को लोग सिर्फ सुन नहीं रहे, बल्कि चटकारे लेकर परोस भी रहे हैं। कोई इसे ‘पान कांड’ कह रहा है, तो कोई ‘25 हजार की राजनीति’। पवित्र नगरी में भले ही मंदिरों की घंटियां बजती हों, लेकिन इन दिनों गलियों में इस किस्से की गूंज ज्यादा सुनाई दे रही है।
कार्यकारिणी को लेकर विरोध के स्वर
जिले की सियासत में इन दिनों प्रमुख विपक्षी पार्टी की रसोई कुछ ज्यादा ही गर्म नजर आ रही है। जिला कार्यकारिणी को लेकर अंदरखाने चल रही खींचतान अब चुपचाप बैठने को तैयार नहीं, बल्कि सोशल मीडिया की थाली में सजकर परोसी जा रही है। ताजा मसाला एक युवा नेता ने डाला है, जिन्होंने अपने ही घर की हलचल को खुलेआम सोशल मीडिया पर उछाल दिया। शब्दों में गुस्सा था, अंदाज में तंज और इशारों में साफ संदेश था कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा।
बस फिर क्या था, पोस्ट आते ही राजनीतिक गलियारों में ‘रीड’ और ‘फॉरवर्ड’ की रफ्तार बढ़ गई। लोग खबर कम और उसके पीछे की कहानी ज्यादा खोजने में जुट गए। अब इसे सिर्फ एक नेता की नाराजगी मानकर टाला भी नहीं जा रहा। जानकार इसे जिला कांग्रेस के अंदर चल रही उठापटक का ‘ट्रेलर’ बता रहे हैं। कौन किसके साथ है, किसकी दावेदारी मजबूत हो रही है और किसका पत्ता कट सकता है। इन सवालों ने चर्चा को और भी चटपटा बना दिया है।
दिलचस्प यह है कि पार्टी मंच से ज्यादा अब सोशल मीडिया ही असली अखाड़ा बनता जा रहा है, जहां बयान भी आते हैं और संदेश भी दिए जाते हैं। कुल मिलाकर विपक्षी पार्टी की अंदरूनी खिचड़ी अब धीमी आंच से निकलकर खुली कढ़ाई में पकती दिख रही है और सियासी चटखारे लेने वालों के लिए यह किसी दावत से कम नहीं।
फूल छाप कांग्रेसियों की जुगलबंदी
शहर की सियासत में इन दिनों एक नई ‘सुर-ताल’ सुनाई दे रही है और ये सुर किसी मंच से नहीं, बल्कि बंद दरवाजों के पीछे बज रहे हैं। चर्चा है कि कुछ ‘फूल छाप’ कांग्रेसी इन दिनों सत्ता पक्ष के एक पावरफुल नेता के निवास पर गुपचुप हाजिरी लगा रहे हैं। अब इसे महज शिष्टाचार मुलाकात कहा जाए या सियासी ‘रियाज़’, ये समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन किस्सों में मसाला भरपूर है।
दिलचस्प यह है कि जैसे ही शहर में उस पावरफुल नेता की मौजूदगी की खबर उड़ती है, वैसे ही ये ‘फूल छाप’ चेहरे अचानक सक्रिय हो उठते हैं। मानो किसी अदृश्य घंटी की टन-टन होते ही सबको बुलावा आ गया हो। फिर क्या सीधे उनके दरबार में हाजिरी, मुस्कान के साथ बातचीत और बाहर निकलते ही ‘सब निजी है’ का राग, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब कैमरों की नजर पड़ जाती है।
वही नेता, जो अंदर बड़े इत्मीनान से जुगलबंदी निभा रहे होते हैं, बाहर आते ही नजरें चुराते दिखते हैं। कोई मोबाइल में व्यस्त हो जाता है, तो कोई अचानक रास्ता बदल लेता मानो कैमरा नहीं, कोई सियासी आईना सामने आ गया हो। अब इस पूरी ‘जुगलबंदी’ को लेकर शहर के राजनीतिक गलियारों में चटकारे खूब लिए जा रहे हैं।
कोई इसे आने वाले सियासी समीकरणों की बिसात बता रहा है, तो कोई इसे ‘फूल से फल’ बनने की तैयारी। सच्चाई जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि ये गुपचुप मुलाकातें अब खुली चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं और हर कोई अपने-अपने अंदाज में इसका मतलब निकालने में जुटा है।
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