Politics: राजनीतिक हलचल: किस मौकापरस्त की जुगलबंदी से समर्थकों का कलेजा फटा?? माननीय का दर्द घर की चारदीवारी से कैसे आया बाहर??? सर्वमान्य नेता के बर्थडे पर उनके समर्थक क्यों हुए दूर???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में……

मौका-परस्तों की जुगलबंदी से समर्थकों का कलेजा जला
विपक्षी पार्टी में इन दिनों एक नया तड़का लगाया जा रहा है—और वो है अवसरवादी नेताओं की जुगलबंदी! पार्टी के कुछ पुराने, तपे-तपाए समर्थक इस मेल-मिलाप को हजम नहीं कर पा रहे। उनका कहना है कि पार्टी प्रमुख ने एक मौका-परस्त अल्पसंख्यक नेता के साथ हाथ क्या मिलाया—समर्थकों के पेट में दर्द शुरू। कुछ तो कह भी रहे—ये जुगलबंदी पार्टी को गर्त में ले जाएगी( चर्चा जोरों पर है कि पार्टी प्रमुख ने नाराज़ समर्थकों को ठंडा करने के लिए नेताजी की थोड़ी कटौती भी करवाई है, पर समर्थकों का जवाब बिल्कुल दो टूक— स्थाई इलाज करो, वरना हम भी चुप नहीं बैठेंगे। अब अगले दिनों में पार्टी प्रमुख क्या नुस्खा अपनाते हैं, यह देखना मीडिया वालों के लिए भी दिलचस्प होगा। बताते चले कि यह अल्पसंख्यक नेता बिना पेंदी के लोटे माने जाते है।
माननीय का दर्द घर की चारदीवारी से आया बहार
आरक्षित क्षेत्र से एक वरिष्ठ माननीय—जो आमतौर पर कम बोलो, ज्यादा सिक्के जमा करो वाली शैली में राजनीति करते हैं।इन दिनों दुख के महासागर में गोते लगाते दिखाई दे रहे हैं। पार्टी में उनकी पूछ परख ऐसी है जैसे बड़ी थाली में छोटा कटोरा। कार्यकर्ताओं के कामों के लिए अफसरों से बोले—पर अफसरों ने इतनी घुमावदार बात की कि माननीय भी भ्रम में पड़ गए। नियुक्तियों की सूची में अपने किसी भी करीबी का नाम न देखकर माननीय ने दर्द दबाते-दबाते आखिर पार्टी प्रमुख के सामने छलका ही दिया। मर्यादा में रहकर कहा—साहब, अफसर लोग गुमराह कर रहे हैं। अब लोग तो यह तक कह रहे है कि जिले के सबसे वरिष्ठ माननीय की हालत अगर ऐसी है, तो बाकी की क्या कहें!
सर्वमान्य नेता के बर्थडे पर ‘गायब’ हुए उनके ही समर्थक
यह किसी ने सोचा भी नहीं था—सर्वमान्य नेता का जन्मदिन और समर्थकों की ‘नो शो’! हर साल शहर रंगीन हो जाता था—होर्डिंग, गाड़ी रैली, अखबारों में चमचमाते विज्ञापन, और शक्ति प्रदर्शन का महापर्व। लेकिन इस साल माहौल ऐसा जैसे बिना नमक की खिचड़ी। जब समर्थकों से पूछा गया, तो जवाब आया कि अरे… दूसरे में एडजस्ट कर लेंगे! अब राजनीति वाले जानें कि ये दूसरा क्या और एडजस्ट किसके साथ करना है। बाजार में तो चर्चा गर्म है कि जिला राजनीति में चल रहे बदलावों ने नेताओं को चुपचाप लाइन बदलने का संकेत दे दिया है। कई जानकार तो कह रहे है कि भाई, ये शांति नहीं… तू$फान से पहले की सन्नाटा है




