Politics: राजनीतिक हलचल: कौनसी ट्रोल टीम अपनों के लिए परेशानी का सबब बनी?? साले जी के बाद चंगू- मंगू के गणित से आखिर क्यों बढ़ रही नेताजी की परेशानी??? सोशल मीडिया पर कैसे चल रही पद के लिए होड़???? विस्तार से पढ़िए हमारे चर्चित कॉलम राजनीतिक हलचल में…..

ट्रोल टीम का गजब कारनामा
सोशल मीडिया का चलन तेजी से बढ़ने के बाद पार्टियां अपने खास सिपाहसलारों को समय-समय पर गाइड कर रही है। बैतूल में एक विपक्षी पार्टी प्रमुख के पास ऐसी ट्रोल टीम है, जिसकी कमान उनके निज सहायक और एक गांव के पुराने नेता के हाथ में है। इसी ट्रोल टीम को विरोधी दल के नेताओं से ज्यादा अपने दल के नेताओं को टारगेट बनाने को लेकर खूब चर्चाएं हो रही हैं।
चर्चा है कि इस ट्रोल टीम के किसी ट्रोलर को कोई दबोच लेता है तो वह सीधे मुंह हैंड्रलर और निज सहायक का नाम लेने से नहीं चूकता है। निज सहायक की बढ़ती दखलअंदाजी से पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी देखी जा रही है। कोई खुलकर नहीं बोल रहा है, लेकिन अंदरखाने की खबर है कि इनके विरोध में कई कार्यकर्ता किसी भी समय सार्वजनिक बयानबाजी कर सकते हैं। यह वही निज सहायक है जो गंभीर रूप से बीमार होने के बाद खुद पर छोड़ दिया गया है। हालांकि बाद में वह अपना स्थान बचाने में कामयाब रहा है।
चंगू-मंगू बिगाड़ रहे नेता जी की छवि
एक भला मानुष कहे जाने वाले माननीय की छवि उनके तथाकथित साले और चंगू-मंगू की गैंग बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। चंगू-मंगू की वजह से उनकी छवि इतनी गर्त में जा रही है कि यदि आज चुनाव हो जाए तो यहां के परिणाम चौकाने वाले आ सकते हैं। यह बात पूरे क्षेत्र में कार्यकर्ताओं से लेकर आम लोगों की जुबान पर भी है।
चर्चा यह भी है कि तथाकथित साले और चंगू-मंगू की आड़ में संबंधित थाने की पुलिस को ऐसे फरमान जारी किए गए हैं कि चाहकर भी क्षेत्र के सट्टा और जुआं बाजार बंद नहीं हो पा रहा है। इससे न सिर्फ नेता जी बल्कि पुलिस की छवि भी बिगड़ रही है। चर्चा तो यह भी है कि सत्ता पक्ष के कई पदाधिकारी इससे आहत और नाराज है। पार्टी के प्रदेश मुखिया को भी इस बारे में प्रमाणित जानकारी दी जा चुकी है। अब देखना यह है कि माननीय इस बारे में क्या निर्णय लेते हैं।
पद के लिए जाति का मोह
सत्तारूढ़ पार्टी में पिछले दिनों पदों की रेवड़ियां बट चुकी है। यह रेवड़ियां कुछ के हाथ लगी तो कुछ ऐसे भी है जो गंभीर दावेदार होने के बावजूद इसे हासिल नहीं कर पाए। दूसरी तरफ बचे हुए पदों को लेकर जातिवाद को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर पोस्ट वायरल हो रही है।
इसमें हवाला दिया जा रहा है कि पिछले पदों में उनकी जाति को तवज्जों नहीं दी गई तो घोषणा होने वाले पदों में बहुसंख्यक जाति वाले पदाधिकारियों को मौका दिया जाए। हालांकि खुलकर कोई नहीं बोल पा रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर दबी जुबान से पद के लिए अपनी पीड़ा जाहिर कर चुके नेताओं को आस है कि उनकी बात संगठन तक जरूरी पहुंचेगी। हालांकि उन्हें भय भी है कि इससे उन्हें फायदा होने के साथ नुकसान भी हो सकता है।
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